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Khwaja Garib Nawaz Quotes Hindi English Urdu

Hazrat Khwaja Moinuddin Chishti (R.A.) is remembered across the world for spreading peace, kindness, humanity, and love. Many people search for Khwaja Garib Nawaz quotes Hindi English Urdu to read spiritual teachings that inspire patience, honesty, forgiveness, and respect for others.

 

His beautiful sayings continue guiding millions of followers who wish to live a peaceful and meaningful life. The teachings of Khwaja Garib Nawaz (R.A.) encourage helping needy people, speaking politely, and staying connected with faith and good character. Even today, devotees from different countries read and share these timeless spiritual quotes for inner peace, motivation, and positive guidance in daily life.

Spiritual Wisdom and Peaceful Sayings of Khwaja Garib Nawaz

इरशादात-ए-ख़्वाजा-ए-बुजुर्ग

 

अहले शरीयत के लिए दस शर्तें लाज़िम हैं

 

1. मारिफत में कामिल होना

 

2. तलब-ए-मुर्शिद

 

3. अदब

 

4. रज़ा

 

5. मोहब्बत

 

7. इस्तेकामाते शरीयत

 

6. तक़्वा

 

9. ख़ल्क से उज्लत इख़्तेयार करना

 

8. कम खाना व कम सोना

 

10. रोज़ा और नमाज़

 

 

सालिक 

 

खुदपरस्ती और नफ़्सपरस्ती बुत-परस्ती है। जब तक खुदपरस्ती नहीं छोड़ोगे खुदापरस्ती हासिल न होगी।

 

तस्लीम व दावा एक जगह जमा नहीं हो सकती।

 

मुलाज़िमत परवरदिगार की इबादत से हासिल होती है।

 

जो बुजुर्गी का दावा करता है, कैद में रहता है।

 

मौत के वास्ते हमेशा तैयार रहो।

 

जो शख़्स झूठी कसम खाता है, अपने घर को वीरान करता है। उसके घर से खैरो बरकत उठ जाती है।


 

दुनिया में दो बातों से खुशतर (अच्छी) कोई बात नहीं अव्वल मोहब्बत-ए-फुक्रा और दोयम हुरमते औलिया।

 

मुसीबतज़दो की फरियाद सुनना और उनका साथ देना, हाजतमन्दों की हाजत रवाई करना, भूखों को खाना खिलाना और असीरों (कैदी) को कैद से छुड़ाना, यह बातें खुदा के नज़दीक बड़ा मर्तबा रखती हैं।

 

नेकों की सोहबत नेक काम से बेहतर है और बदों की सोहबत बद काम से बदतर है।

 

सबसे अच्छा वक़्त वो है जबकि वसवसा-ए-नफ़्स न हो और ख़ल्कत से रिहाई हासिल हो।

 

दुनिया फानी है और कारहाये (ज़िम्मेदारी) दुनिया लायनी (बैमानी) है।

 

गुनाह तुमको इतना नुकसान नहीं पहुँचाता। जितना मुसलमान भाई को ज़लील और बेइज़्ज़त करना।

 

अल्लाह तआला की पहचान की अलामत यह है कि बन्दा खामोश रहे और मख़्लूक से दूर भागे।

 

ऐ अज़ीज़ दुनिया से इतना मशगूल मत हो कि हक से बाज़ रहे।

 

कब्रिस्तान में हंसना नही चाहिए कि वो इबरत की जगह है न की खेल-कूद की।

 

राहे-सुलूक में बहुत से मर्द आजिज़ और आजिज़ मर्द हो गये हैं।

 

दरम्याने अहले सुलूक के कहकहा गुनाह-ए-कबीरा में से एक है।

 

कयामत के दिन आतिशे दौज़ख से बचने के लिए सबसे बेहतर अमल यह है कि ज़रूरतमन्दों की ज़रुरत पूरी की जाए, भूखे को खाना खिलाया जाए और दर्दमन्दों आजिज़ो की फरियाद को पहुँचा जाए।

 

अगर हो सके तो बका हासिल करो। सलाहियात और जुहद (परहेज़) तो एक हवा की तरह है। जो तुमसे चलती है, क्यूँकि बका ऐन-ए-हक है।

 

इल्म मुहीत (दायरा) है और मग़फिरत उसका खुजू (गिड़गिड़ाना), बस खुदा कहाँ और बँदा कहाँ? इल्म खुदा को ही है मगर मग़फिरत हर दो को है।

 

तौबा के चन्द मुकामात हैं, जाहिल से दूर रहना, बातिल को तर्क करना, मुनकरों से रूदगिरानी करना, मोहिब से मुहब्बत करना, तौबा को दोस्त करना, मुज़ालिम को रद्द करना।

 

कयामत के दिन कोई चीज़ फायदा पहुँचाएगी तो वह जुहद (परहेज़) व तक़्वा (पारसाई) है न कि इल्म-ओ-अमल।

 

शकवत (बदबख़्ती) की अलामत यह है कि इन्सान गुनाह करके भी अपने मक़बूल होने की उम्मीद रखे।

 

ऐ ग़ाफ़िल ! उसी सफर का तौशा तैयार कर जो तुझे दरपेश है। यानी सप्रे आखिरत ।

 

रहमत-ए-हक से कोई चीज बेईद नहीं मगर इन्सान को लाज़िम है कि इताअत-ए-हक तआला में कोताही न करे और उसको किसी हाल में न भूले।

 

इल्म दरिया-ए-मुहीत है और मग़फिरत दरिया की लहरें। इल्म खुदा को है और मग़फिरत बन्दे को। लिहाज़ा बन्दा खुदा नहीं बन सकता।

 

मुतावक्किल हकीकत में वह शख़्स है, जो अपने लिए मख़्लूक को कोई तकलीफ न दे।

 

हक़ीक़तन मुतावक्किल वो है, जो ख़ल्कत से आज़ाद और रन्ज पहुँचाने पर न किसी से शिकायत करे न हिकायत ।

कुर 'आन

 

जो शख्स कुरआन शरीफ पढ़ने में हंसता है तुम तहकीक जानो कि वोह मुनाफिक है।

 

कलाम-ए-मजीद का देखना इबादत है, शराअ औलिया में लिखा है "जो कोई कलाम-ए-मजीद को देखे या पढ़े उसको खुदा-ए-तआला दो सवाब अता फरमाता है एक ज़ियारते कुराने पाक का और दूसरा उसके पढ़ने का।

 

अल्लाह तआला ने कलाम-ए-मजीद के शुरू के पारा में फरमाया है कि "यह वो किताब है, जिसमें कोई शक नहीं है, हिदायत है कि हर इन्सान को अपने अकाइद दुरस्त रखने चाहियें कामयाबी और राहत हासिल करने की यही सूरत है।

 

सूरह फातिहा में सात आयात हैं और हर इन्सान के जिस्म में भी, उसको पढ़ने वाले को अल्लाह तआला सातों दोज़ख से बचाऐगा।

 

नमाज़

 

नमाज़ में लोग मन्ज़िल गाहे इज़्ज़त के करीब होते हैं, क्यूँकि नमाज़ मोमिन की मैराज है।

 

मोमिन की मैराज यही नमाज़ है, जिसके बगैर अल्लाह तआला का कुर्ब हासिल नहीं हो सकता।

 

नमाज़ दीन का रुक़्न है और रुक्न सुतून हो जाता है, बस जब सुतून कायम हो गया तो मकान भी कायम होगा और जब सुतून निकल जाएगा तो छत गिर पड़ेगी।

 

जिस कुद्रे-हुजूरी कल्ब और खुशू (खौफ व हैबत) व खुजू (गिड़गिड़ाने) से नमाज़ अदा करेगा, उतना ही कुर्ब हासिल होगा।

 

नमाज़ एक औहदा है, अगर इस औहदे से सलामती के साथ बरी-ए-ज़िम्मा हो गया तो निजात है, वर्ना शर्मिन्दगी की वजह से मुँह खुदा के सामने न होगा।

 

अगर नमाज़ के अरकान ठीक तौर पर अदा नहीं होते हैं तो पढ़ने वाले के मुँह पर मार दी जाती है।

 

जल्दी तौबा करो मौत के आने से पहले और उजलत करो नमाज़ के वक़्त गुज़र जाने से पहले।

मोहब्बत

 

इश्क-ओ-मोहब्बत में गुफ़्तगू, हुरमत-ओ-मशगला उसवक़्त तक होता है, जबतक बाहर रहे, जब

 

अन्दर दाखिल होता है तो ख़ामोशी, सुकून और आराम मयस्सर हो जाता है और फरियाद व शोर बाकी नहीं रहता।

 

अहले सुलूक में मोहब्बत एक ऐसा इल्म है, जो लाखों उल्मा उसको समझना चाहते हैं मगर ज़र्रा बराबर भी खबर नहीं होती।

 

अहले मोहब्बत के गिर्द-ओ-हक के दरमियाँ कोई हिजाब नहीं इबादत का ललफाल है।

 

अहले मोहब्बत वो लोग हैं, जो सिर्फ हक तआला की बात सुनते हैं।

 

जब अहले मोहब्बत मरता है तो जल्द बख़्श दिया जाता है।

 

जिसको मोहब्बत व फख अता किये जाते हैं, उसे वहशत नहीं दी जाती कि वह उसपर फरेफ्ता (शैदा) हो जाए।

 

सादिक मोहब्बत में वो है कि जब बुलावा दोस्त की जानिब से आये उसे निहायत खुशी से कुबूल करे।

 

मोहब्बत में सादिक वो है, जिसपर दोस्त मुसीबत नाज़िल करे और वो उसे ब 'रगबत कबूल करे।

 

तजरीद यह है कि सिफाते महबूब, मोहिब के दिल और सिफात में जा गुज़री हो जाए जैसा कि इरशाद-ए-बारी तआला है कि "जो मुझसे मोहब्बत करता है, मैं उसका कान और आँख बन जाता हूँ"।

 

आशिक का दिल मोहब्बत का आतिशकदा है, जो भी उसमें दाखिल हुआ जलाकर खाक कर देता है क्यूँकि इश्क की आग से तेज़ कोई आग नहीं होती है।

 

अहले मोहब्बत उस महबूब-ए-हकीकी की दोस्ती में दोनों जहान को खर्च कर देते हैं और यही समझते हैं कि अभी कुछ भी नहीं किया।

 

राहे मोहब्बत वो राह है, जिसने इसमें कदम रखा गुम हो गया।

 

मोहब्बत वालों के दिल की शिनाख्त यह है कि फरमाबरदार और ख़ाइफ (ख़ौफ़ज़दा) होकर मुवादा दोस्त से नाखुश होकर अपनी मोहब्बत से अल्हैदा कर दे।

दोस्त

 

दोस्त के इसरार हसीन होते हैं इसलिए आशिक के दिल में कयाम करते हैं।

 

अहले मोहब्बत बिला वास्ते दोस्त का कलाम सुनते हैं।

 

हक़ की दोस्ती की खातिर दोनों जहान लुटा देना आसान है।

 

अगर दोस्त की दोस्ती में दोनों जहान बख़्श दिए जाए तब भी कम है।

 

दोस्ती उसका नाम है कि उसका ज़िक्र दिल से करें, क्यूँकि दिल याद के लिए बनाया गया है।

 

दोस्त के इसरार खूबसूरत हैं और खूबसूरती आशिक के दिल ही में जा गज़ी होती है।

 

खुदा तआला उस शख्स को दोस्त रखता है। जिसमें दरिया जैसी सखावत, आफताब जैसी शफ़क्त और जमीन जैसी तवाज़ो हो।

 

दिल वही है जो अपने हाल से खाली हो और मुशाहिदा दोस्त में बाकी हो।

 

यकीन एक नूर है जिससे इन्सान मुनव्वर हो जाता है। बाद अज़ा मोहिब्बाने फैज़ान में शामिल हो जाता है।


 

मारिफत

 

सबसे पहली चीज जो इंसान पर फर्ज हुई। वह मारिफत है।

 

अहले मारिफत सूरज के मानिन्द होते हैं, जिनसे तमाम जहानों पर रोशनी पड़ती है।

 

मारिफत खुदा की पहचान और अलामत है। मखलूक से भागना और खुदा की मारिफत के मसले पर चुप रहना।

 

दुनिया के लोग दुनियावी हालात में माजूर हैं। आख़िरत के लोग सुरूरे दस्त-ए-हक से मसरूर हैं और मारिफत वालों के लिए नूर अला-नूर है।

 

अहले मारिफत की इबादत पास इनफास है।

दरवेश

 

दरवेश में इतनी कुव्वत बातिनी होनी चाहिए कि अगर सुननेवाला हिकायते औलिया में शक करे तो उसे मुशाहिदा कराकर काइल करे।

 

दरवेश उसका नाम है कि जो आये उसे महरूम न जाने दे, अगर भूखा है तो खाना खिलाये और अगर नंगा है तो कपड़ा पहनाऐ, हर हाल से खाली न जाने दे।

 

बन्दे को हक तआला से इस कद्र निस्बत पैदा करनी चाहिए कि जो कुछ वो चाहे वो कुबूल करे और अगर इस कद्र न हो तो उसको दरवेश नहीं कहना चाहिए।

 

अहले इरफान यादे खुदा के सिवा और कोई बात जुबान से नहीं निकालते।

 

कमाल दर्जा-ए-इरफान का यह है कि अपने नूरे इरफान का पड़तव लोगों के दिलो पर डाले।

 

फकीरी का इस्तिकाक उस शख्स को होता है, जो आलमे फानी में से अपने पास कुछ बाकी न रखे।


 

मुर्शिद

 

तरीकृत की राह चलने वाले को लाज़िम है कि अव्वल दुनिया को, बाद उसके माफीहा (जो कुछ इस दुनिया में है) को तलाक दे, फिर अपनी नफ़्स को तलाक दे, तब अहले सुलूक के रास्ते में कदम रखे, वरना छोड़ दे।

 

जब हुजूरी हासिल होती है तो फरियाद-ओ-गुफ़्तगू नहीं रहती।

 

आदतपरस्त हरगिज़ हकपरस्त नहीं होता, तर्क आदत करके तरबियते मुर्शिद हासिल करना मर्दो का काम है।

 

मुरीद मुस्तहिके फख उस वक़्त होता है, जबकि आलमे फानी में बाकी रहे।

 

अपने पीरो मुर्शिद के चेहरे की तरफ देखना और खिदमत में मसरूफ रहना एक किस्म की इबादत है।

 

दरियाओं का पानी शोर करता है, लेकिन जब समन्दर में मिल जाता है तो उसकी आवाज़ नहीं रहती।

 

पीर को देखना और खिदमत करना इबादत है।

 

जिस किसीने जो पाया पीर की ख़िदमत में पाया, बस मुरीद को चाहिए कि ज़र्रा भर फरमाने पीर से तजावुज़ (खिलाफवर्जी) न करे और जो कुछ उसको पीर तलकीन (नसीहत) फरमाए, उसपर कान धरे और अमल करे।

आरिफ

 

आरिफ की खसलत मोहब्बत में इखलास (बेलौसी) है।

 

आरिफ का इशारा आशिकी और बेनियाज़ी है और मजनूँ का इशारा आरजू है।

 

आरिफ वह है कि ख़्वाह वो कही पर हो और कुछ माँगे उसके पास आये। जिससे बात करे और उसीसे जवाब भी पाए, जो अल्लाह के सिवा किसी और के पास जाए या किसी और से कुछ तलब करे वह आरिफ नहीं।

 

आरिफों में सादिक वह है, जिसकी मिल्कियत में कुछ न हो और न वह किसीकी मिल्क में हो।

 

आरिफ़ों का तवक्कल सिवाए खुदा के किसी और पर नहीं होता न वो दूसरों की तरफ इल्तिफात (तवज्जो) करते हैं।

 

आरिफ याद-ए-इलाही के सिवा और कोई बात जुबान से नहीं निकालते।

 

आरिफ की एक अलामत यह है कि वह हर वक़्त मौतसिम (तवक्कल करने वाला) रहता है।

 

आरिफ की पहचान यह है कि वो मौत को अज़ीज़ रखता है और अल्लाह तआला के ज़िक्र के सिवा और किसी शह से उसे चैन नहीं आता।

 

आरिफ मोहब्बत में कामिल उस वक़्त होता है, जब दरम्यान से गुफ़्तगू उठ जाए, ऐसा हो जाए या दोस्त रहे या खुद ।

 

आम हाजी काबा के गिर्द अपने जिस्म से त्वाफ करते हैं और आरिफ हिजाबे-अज़मत और अर्श के गिर्द अपने दिल का त्वाफ करते हैं और दीदारे ईलाही का इश्तेयाक (आरजू) ज़ाहिर करते हैं।

 

आरिफ उसको कहते हैं कि आलमे गैब से रोज़ सौ हज़ार तजल्लियाँ उसपर ज़ाहिर हों।

 

आरिफ वो है कि अपनी अक़्ल से रुमूज़ करे और तमाम सवालों का जवाब दे सके और हर वक़्त दरिया-ए-मानी में तैरे इसरार-ओ-अनवार के मोती लेकर मुसव्विरों के सामने पेश करे।

 

आरिफ जब किसी पर गौर करता है तो उसकी ये हालत हो जाती है कि अगर उस वक़्त हज़ार फरिश्ते भी अजीब-अजीब शक्लों में पेश किये जाएँ तो भी उसकी तरफ मुखातिब न होगा।

 

आरिफ का यह दर्जा होता है कि एक कदम में अर्श से गुज़रकर हिजाबे अज़मत तक पहुँचता है और कामिल दर्जा खुदा ही जानता है कि कहाँ तक जाता है और वापिस आता है और क्या देखता है।

 

आरिफ वो है जो अपने दिल से सब चीज़ो को निकाल दे और यक़्ता हो जाऐ, जैसा कि उसका दोस्त यक्ता है।

 

आरिफ जब ख़ामोश होता है तो उससे मुराद है कि हक़ से बात करता है और जब आँखे बन्द करता है तो गोया हक को तलब करता है।

 

आरिफ इन्तेहाई मुकामे इरफाँ तक नहीं पहुँच सकता है, जबतक कि अपने मसारिफे साबिका की याद कायम न रखे।

 

आरिफ का कमाल अपने को फूंक देता है।

 

तवक्कल आरिफ का यह है कि हमेशा आलमे हैरत और शुक्र में रहे।

 

कमतर चीज़ जो आरिफों पर ज़ाहिर होती है, वो यह है कि माल-ओ-मुल्क से अलैहदगी इख़्तेयार करते हैं।

 

आरिफ उस वक़्त तक रोता है, जबतक कि राह में होता है, जब हकाइक के करीब पहुँचता है और विसाल हो जाता है तो गिर्या नहीं करता।

 

आरिफ की अलामत है कि वोह ख़ामोश और गमगीन रहता है।

 

खुदा की पहचान उस शख्स को होगी जो गफलत से अल्हेदा रहे और खुद को आरिफ न समझे।

 

अव्वल राहे शरिअत, दोयम राहे तरीक्त, सोयम राहे मारिफत और चारम राहे हकीकत है। तालिब जब सादिक रहता है तो तरक्की करता हुआ मर्तबा-ए-हकीकत तक पहुँचता है।

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