In Islamic history, Wali Allah and Auliya Allah are respected people known for faith, honesty, kindness, and helping others. Many Muslims visit the places connected with famous saints to pray, seek peace, and remember good teachings.
A true Wali Allah always guides people toward patience, humanity, prayer, and love for everyone. These respected personalities never taught hate or pride.
Their simple lifestyle and care for poor people made them special in the hearts of many families around the world. Learning about Auliya Allah in simple Hindi helps readers understand Islamic values, spiritual guidance, and the importance of character in life
औलिया अल्लाह और कुर 'आन
يَأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اتَّقُوا اللَّهَ وَابْتَغُوا إِلَيْهِ الْوَسِيلَةَ
कुर 'आने करीम में औलिया अल्लाह का ज़िक्र जगह-जगह आया है और उनकी तारीफ मुख्तलिफ पैराईयों से की गयी है। मसलन सूरह यूनुस में उनकी एक बहुत बड़ी अलामत यह बताई गई है कि इनके लिए ग़म और खौफ न तो दुनिया में होता है और न आख़िरत में -
कुर'आन :
الَّا إِنَّ أَوْلِيَاءَ اللهِ لَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ
तर्जुमा : याद रखो औलिया अल्लाह पर न तो किसी किस्म का ख़ौफ और डर तारी होगा न वो गमगीन होंगे।
(सूरह यूनुस, आयत 62)
الَّذِينَ آمَنُوا وَكَانُوا يَتَّقُونَ
तर्जुमा : यह वो लोग हैं कि अल्लाह पर सच्ची रूहों की तरह ईमान लाये और अपने आमाल में उसका ख़ौफ पैदा किया।
(सूरह यूनुस, आयत 63)
لَهُمُ الْبُشْرَى فِي الْحَيَوةِ الدُّنْيَا وَفِي الْآخِرَةِ لَا تَبْدِيلَ لِكَلِمَتِ اللَّهِ ذَلِكَ هُوَ الْفَوْزُ الْعَظِيمُ :
बस उनके लिए दुनिया की ज़िन्दगी में खुशखबरी है और आख़िरत में भी। यह अल्लाह का कानून है और अल्लाह के कलमात में ज़रा भी झगड़े नहीं होती, इन्सान के लिए यही सबसे बड़ी कामयाबी है।
(सूरह यूनुस, आयत 64)
اللهُ وَلِيُّ الَّذِينَ آمَنُوا يُخْرِجُهُمْ مِنَ الظُّلُمَتِ إِلَى النُّوْرِ
तर्जुमा : अल्लाह तआला मोमिनों का दिली दोस्त है। वो उन्हें तारीकी से निकाल कर रोशनी में लाता है
(सूरह बकर , आयत 257)
وَاللَّهُ وَلِيُّ الْمُؤْمِنِينَ
तर्जुमा - और अल्लाह मोमिनों का वली यानी दोस्त है।
(सूरह आले इमरान, आयत 68)
وَاللهُ وَلِيُّ الْمُتَّقِينَ
तर्जुमा - और अल्लाह मुत्तकी इन्सानों का वली है।
وَهُوَ يَتَوَلَّى الصَّلِحِينَ
तर्जुमा - अल्लाह स्वालेह इन्सानों का दोस्त है।
(सूरह अराफ, आयत 196)
सूरह जुमा में इस गिरोह की एक आज़माईश बतलाई गयी है, जिसमें पड़कर यह मालूम हो जाएगा कि कौन औलिया अल्लाह में से है और कौन औलिया अल शैतान में से है?
قُلْ يَأَيُّهَا الَّذِينَ هَادُوا إِنْ زَعَمْتُمْ أَنَّكُمْ أَوْلِيَاءُ لِلَّهِ مِنْ دُونِ النَّاسِ فَتَمَنَّوُا الْمَوْتَ إِنْ كُنْتُمْ صَدِقِينَ
तर्जुमा : ऐ पैग़म्बर ! यहूदियों से कह दो कि अगर तुम को इस बात का दावा है कि तमाम बन्दों में से तुम ही अल्लाह के दोस्त और वली हो तो इसकी आज़माईश यह है की खुदा की राह में मौत की आरजू करो। अगर तुम सच्चे होगे तो ज़रूर ऐसा ही करोगे।
(सूरह जुमा, आयत 6)
إِنَّمَا وَلِيُّكُمُ اللهُ وَرَسُولُهُ وَالَّذِينَ آمَنُوا الَّذِينَ يُقِيمُونَ الصَّلوةَ وَيُؤْتُونَ الزَّلُوةَ وَهُمْ رَاكِعُونَ
तर्जुमा : मुसलमानों तुम्हारा दोस्त अल्लाह और उसका रसूल है और वोह मोमिन जो इमान ला चुके हैं, जो सलाते-ईलाही को दुनिया में कायम करते हैं। जो खुदा की राह में अपना माल खर्च करते हैं और जो हर वक़्त अल्लाह और उसके हुक्मों के आगे झुके रहते हैं।
(सूरह माएदा, आयत 55)
وَمَنْ يَتَوَلَّ اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَالَّذِينَ آمَنُوا فَإِنَّ حِزْبَ اللَّهِ هُمُ الْغَلِبُونَ اللَّهِ
तर्जुमा : बस जो शख़्स अल्लाह, उसके रसूल और मोमिनों का दोस्त व वली होकर रहेगा, वो हिज़्बुल्लाह में से है और यकीन करो के हिज़्बुल्लाह के लोग ग़ालिब होने वाले हैं।
(सूरह माएदा, आयत 56)
इस आयते करीमा से मालूम होता है कि जो लोग अल्लाह के वली और उसके दोस्त हैं, उनका एक नाम लिसानुल्लाह हिल हकीम में हिज़्बुल्लाह भी है।
हिज्ब कहते हैं गिरोह और जमात को हिज़्बुल्लाह से मकसूद वो लोग हुए हैं, जो अल्लाह की जमात हो।
चुनाँचे सूरह हश्र में फरमाया गया है कि जो लोग अल्लाह की मोहब्बत की राह में दुनिया के तमाम रिश्तों की कुछ परवाह न करें, हत्ता की माँ-बाप और अज़ीज़-ओ-अकबा की दामनगिरी को भी हींच समझें और खुदा की पुकार जब उनके कानों में पड़ जाऐ तो सब कुछ छोड़छाड़ कर उसकी तरफ दौड़ जाएँ तो ऐसे लोग हिज़्बुल्लाह हैं।
الَّا إِنَّ حِزْبَ اللَّهِ هُمُ الْمُفْلِحُونَ
तर्जुमा : यही लोग हिज़्बुल्लाह हैं सुन रखो कि यकीनन हिज़्बुल्लाह ही के अफराद पनाह पाने वाले हैं।
(सूरह मुजादिला, आयत 22)
बाज़ खास हालातो खसाइश की बिना पर उन्हें अस्हाब-उल-मैमना (नेक अमाल वाले), अस्हाब-उल-मशअमा (जहन्नमी) के नामों से भी मौसूम किया गया है, यानी दाहिनी जानिब की जमात और बाईं जानिब का गिरोह।
فَأَصْحَبُ الْمَيْمَنَةِ مَا أَصْحَبُ الْمَيْمَنَةِ وَأَصْحَبُ الْمَشْمَةِ مَا أَصْحَبُ الْمَشْمَةِ وَالسَّبِقُونَ السَّبِقُونَ أُولَبِكَ الْمُقَرَّبُونَ فِي جَنَّتِ النَّعِيمِ
तर्जुमा : अस्हाब-उल-मैमना (नेक अमाल वाले) के मदाज का क्या कहना है कि बड़े ही आली मर्तबा हैं और अस्हाब-उल-मशअमा (जहन्नमी) की बदबखितयों को क्या कहिये कि उनकी हद-ओ-इन्तेहाई नहीं और साबिकों-असाबिकों की दरगाहे इलाही के वही मुकार्रिब बन्दे हैं।
(सूरह वाकैआ, आयत 8-12)
हाब-उल-मैमना को अस्हाब-उल-मयीन भी कहा है और अस्हाब-उल-मशअमा अस्हाब-उल-शिमाल के नाम से भी मौसूम किया है। दोनों का मफ़्हूम एक ही है, चुनाँचे सूरह वाकैआ में अस्हाब-उल-मैमना (नेक अमाल वाले) और अस्हाब-उल-मशअमा (जहन्नमी) का ज़िक्र यूँ किया है।
وَأَصْحَبُ الْيَمِينِ مَا أَصْحَبُ الْيَمِينِ فِي سِدْرٍ تَخْضُودٍ وَطَلْحٍ مَنْضُودٍ وَظِلَّ مَمْدُودٍ وَمَاءٍ مَّسْكُوبٍ
तर्जुमा : अस्हाब-उल-यमीन के लिए बाग़-ओ-बहार की दाएमी खुशियाँ और नज़े (नज़राने) है। जो न तो कभी रोके जा सकेंगे और न कभी उनका सिलसिला टूटेगा।
(सूरह वाकैआ, आयत 27-31)
इसलिए औलिया अल्लाह की इस्लाह और फलाह और कयाम-ए-इन्सानियत का मे 'ला-ओ-मदीना सही का सरचश्मा है।
وَفَاكِهَةٍ كَثِيرَةٍ لَّا مَقْطُوعَةٍ وَلَا مَمْنُوعَةٍ
तर्जुमा : और (उनके लिए) बहुत से मैवे (फल), जो कभी ख़त्म न होंगे और न कभी रोके जाऐंगे।
(सूरह वाकैआ आयत 32-33)
औलिया अल्लाह की इम्तेयाज़ी खुसूसियात
कुर'आन-ए-हकीम के तदब्बुर (गौर-ओ-फ़िक्र) और मुताले से मालूम होता है कि हक-ओ-बातिल, ईमान-ओ-कुफ्र, नूर-ओ-जुल्मत, ताल्लूक-ए-अल्वी व रिश्ता-ए-सिफ़्ली और आमाले स्वालेहा व कारोबारे मफसदा (झगड़ा) वैसे की इख़्तेलाफ के ऐतबार से दो बिल्कुल मुस्तनद और मुखालिफ लोग हमेशा से दुनिया में होते चले आये हैं और जब कभी हक-ओ-बातिल का मार्का गर्म होता है तो इन्हीं जमातों की दो कतारें एक दूसरे के मुकाबिल में सफआरा होती हैं, कुर'आन-ए-हकीम ने मुख्तलिफ नामों से इन दोनों जमातो का ज़िक्र किया है।
मसलन 23 से ज़्यादा मुकामात में एक ऐसी जमात का ज़िक्र किया गया है, जिसने अपने दिलों को हक की कुबूलियत के लिए मुस्तैद कर दिया और जो अपनी तमाम कुव्वतों और तमाम जज़्बे से अल्लाह और उसकी सदाकत को चाहने वाली और प्यार करने वाली है और इसलिए अल्लाह ने भी उन्हें अपना दोस्त बना लिया है! इस जमात को औलिया अल्लाह के नाम से पुकारा गया है। यानी वह खुदा के दोस्त हैं।
अल्लाह के दोस्तों की सबसे बड़ी पहचान यह है कि जब उन्हें जान देने और ज़िन्दगी से उसकी लज्ज़तों से वुस्तबरदार हो जाने की दावत दी जाती है, तो लब्बैक कहते हुए उस तरफ दौड़ते हैं गोया कि भूखों को गिज़ा और प्यासों को पानी की पुकार सुनाई दी, लेकिन जो झूठे हैं वो अल्लाह की विलायत से महरूम है।
वो इंकार कर देते हैं और यह उनके झूठे होने की मुहर है। जो खुद उन्होने अपने ऊपर लगा दी है। मगर मौत की तमन्ना से मकसूद हरगिज़ यह नहीं है कि कोई आदमी मौत को पुकारे और उसके लिए इल्तेजा करे।
अल्लाह का मकसूद उससे यह था कि सच्चे और झूठे आदमी की पहचान के लिए एक कसौटी दे दे। बस फरमाया कि खुदा के दोस्त हो तो मौत की तमन्ना करो, यानी उसके लिए और उसके कलमा-ए-हक के लिए ऐसे कामों में पड़ो, जिनमें जान देने,
अपना खून बहाने, अपने जिस्म को तरह-तरह की मोहलिक मशक्कतों में डालने और ज़िन्दगी के ऐश-ओ-निशात से महरूम होने की ज़रुरत है और उसके बाद फिर खुद ही फैसला करें कि यह काम औलिया अल्लाह का है। औलिया अल-शैतान कभी भी ऐसा नहीं करेंगे, क्यूँकि यह मौत के नाम से डरते और काँपते हैं और ज़िन्दगी के ऐश में पागल हो गये हैं।
قُلْ إِنَّ الْمَوْتَ الَّذِي تَفِرُّونَ مِنْهُ فَإِنَّهُ مُلْقِيْكُمْ ثُمَّ تُرَدُّونَ إِلَى عَلِمٍ الْغَيْبِ وَالشَّهَادَةِ فَيُنَبِّئُكُمْ بِمَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ
तर्जुमा : उनसे कह दो कि ऐ नफ़्स परस्तों जिस मौत से तुम इस कद्र भागते हो, वो कुछ तुम्हें छोड़ न देगी। एक दिन ज़रूर ही आएगी, फिर तुम खुदा के तरफ लौटा दिए जाओगे, जो पोशीदा और ज़ाहिर सब कुछ जानता है।
(सूरह जुम्आ, आयत 8)

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