What is Qawwali Sima is a common question among people interested in Sufi traditions and spiritual music. Qawwali is known for devotional poetry, peaceful gatherings, and soulful performances connected with remembrance of Allah.
Many listeners feel emotional comfort and spiritual peace while attending traditional Sufi music gatherings and listening to meaningful words.
सिमा (कव्वाली)
'कुश्तगन-ए-खंजर ए तस्लीम रा', 'हर ज़मन अज़ गैब जेन दीगर अस्त'
तर्जुमा : जो तस्लीम-ओ-रज़ा के खन्जर से मारे जाते हैं। उन्हें हर लम्हा गैब से एक नई जान अता होती है।
सिमा चिश्तियों की रुहानी गिजा है।
सिमा में मुरीद अपने पीर की रहनुमाई में मालिके हक़ीक़ी तक पहुँचता है।
सिमा में एक शब में वह हासिल हो सकता है, जो कई चिल्लों से भी हासिल नहीं होता।
सिमा का इनेकाद बहुत एहतेमाम से किया जाता है।
क़व्वाली बवुजू होकर साहिबे निस्बत बुजुर्ग का कलाम पढ़ना चाहिए।
सुनने वाला भी बावुजू और दो ज़ानो होकर बैठे हों।
महज़ गाना सुनना या अश्आर सुनना मौसिकी से लुत्फ-ओ-अल्दौज़ होने का नाम सूफिया-ए-किराम के यहाँ सिमा नहीं है, यह तो महफिल-ए-सिमा उसको कहते हैं, जो सिक-ओ-सफा के साथ तलबे-हक के ज़ौक़-ओ-शौक में पाबन्दी-ए-शरायत व अदब के साथ हुजूरी-ए-कल्ब से दो ज़ानो होकर सुनते हैं।
इसी हालत में उनके कल्ब को ता 'यीनात (बरवज़न) वज़्द व हालतारी होती है और रुहानी तरक्की में मदद मिलती है और वो वाक्यात रूनूमा होते हैं। जो बुजुर्गाने दीन के वाक्यात में किये गये हैं।
हज़रत ख़्वाजा हसन बसरी हजरत ख्वाजा हसन बसरी ने फरमाया कि "जो हक सुनता है, हक रसीदा हो जाता है और जो नफ़्स से सुनता है, जिदीक (आतिशपरस्त) बन जाता है।
आप साहिबे सिमा थे और सिमा में वज्द करते थे, आप अकसर फरमाते "वज्द दिल का ऐसा राज़ है, जब इसमें तहरीक (हरकत) होती है तो इन्सान पर वज्द तारी होता है और सिमा दर्दे दिल है, जिसने इसको सच्चाई के साथ सुना वह हक़ तक पहुँच गया।"
'हज़रत अब्दुल वाहिद बिन ज़ैद' और 'हज़रत शैख फुजैल बिन अयाज़' आप दोनों को सिमा बहुत मरगूब था और आप सिमा पसन्द फ़रमाते थे।
हज़रत ख़्वाजा अलू मिमशाद दींवरी आप सिमा को पसन्द फरमाते और अपने मशाइख के उर्स का एहतेमाम करते और सिमा सुनते थे। एक शख्स ने अर्ज किया हज़रत सिमा में क्या असरार हैं, जो आप इस कद्र पसन्द फरमाते हैं? तो आप फरमाते हैं कि "मैं सारे औलिया किराम बुजुर्गाने उज़्ज़ाम ने सिमा को दुरुस्त समझा तो मैं भी उनकी सुन्नत पर गामजन हूँ। अगर सिमा का राज़ लोगों पर ज़ाहिर हो जाए तो फिर सिमा के बगैर लोगों को एक पल के लिए भी चैन नहीं मिले।"
'हज़रत ख़्वाजा अबु इशाक शामी चिश्ती फ़रमाया 'सिमा के दौरान असरारे-ईलाही अहले सिमा
रोशन ज़मीर हो जाते हैं।' आप पर जब सिमा में कैफियत तारी होती तो दर-ओ-दीवार जुम्बिश में आ जाते थे। अगर उनकी मजलिस में कोई बीमार शरीक होता तो अल्लाह तआला उसे सेहतयाब कर देता।
हज़रत अबु अहमद अब्दाल आपको सिमा बहुत ही मरगूब था। हज़रत ख़्वाजा सिरेसक्ती आपकी महफिल में तशरीफ लाया करते थे और मजलिस-ए-सिमा में शिरकत करते।
हज़रत अबु मोहम्मद मुक़्तदी ने फरमाया 'जो फतेहयाब सिमा में होता हैं किसी शगल से मयस्सर नहीं आता, बरसों तक भी अगर कोई शख्स रियाज़दात और मुजाहिदात करें तो उस मर्तबे को नहीं पहुँच सकता, जो उसे एक मर्तबा के सिमा में हासिल होता है।'
हज़रत ख़्वाजा नसीरूद्दीन अबु यूसुफ आप सिमा बहुत ज़ौक़-ओ-शौक से सुनते थे। हालाते सिमा
में आपकी पेशानी मुबारक से ऐसा नूर ज़ाहिर होता था कि ज़मीन-ओ-आसमां तक मुनव्वर हो जाते। हज़रत अबूबक्र शिब्ली अकसर आपकी महफिल में तशरीफ लाया करते और सिमा सुनते।
हज़रत ख़्वाजा मौदूद चिश्ती आपकी मजलिसे सिमा में उल्मा और मशाइख बहुत बड़ी तादाद में शरीक होते थे। मजलिस का आगाज़ व इख़्तेताम कलामे पाक से होता था। दौराने सिमा आप इतना रोते थे कि सभी पर गिरया तारी हो जाता था।
हज़रत ख़्वाजा उस्माने हरवनी आप साहिबे सिमा थे। जब किसीने आपसे सवाल किया तो आपने फरमाया कि "तुम सिमा की कद्र क्या जानो, हमारे पीरों ने तो बराबर सिमा सुना है। किसीने तर्क नहीं किया और मुझे तो उन्ही हज़रात की पैरवी करना लाज़मी है।"
नाएबुन-नबी अता-ए-रसूल सुल्तानुल हिन्द ख़्वाजा गरीब नवाज़ ने सिमा ही के ज़रिये तब्लीगे इस्लाम का काम किया। उल्मा और फिकाह में से किसी ने आपके फिकाह पर ऐतराज़ नहीं किया।
हज़रत कुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी ने सिमा के मुताल्लिक फ्रमाया है कि "यह अल्लाह की खास नैमत है। जो हर शख्स को अता नहीं होती, जिसको यह नैमत अता होती है, वहीं इसकी कद्र जानता है।"
हज़रत ख़्वाजा बाबा फरीदुद्दीन गंजे शकर आप फरमाते हैं कि " अहले सिमा जो सिमा में बेहोश हो जाते हैं, वो उसी अलस्तु बिरब्बैकुम की निदा, जो उन्होंने आलमे अरवाह में सुनी थी। यह वहीं बेहोशी है, जो उस रोज़ से अब तक उनमें पाई जाती है। जब भी दोस्त का नाम सुनते हैं, हरकत, हैरत, ज़ौक़ और बेहोशी तारी हो जाती है। यह सबकुछ मारिफत की वजह से है।
हज़रत निजामुद्दीन औलिया सिमा दर्दमन्दो के लिए ईलाज है, जिसतरह ज़ाहिरी दर्द के लिए ईलाज होता है, उसीतरह बातिनी दर्द के लिए सिमा के सिवा कोई ईलाज नहीं।
जब किसी दिल पर अल्लाह तआला की दोस्ती का गल्बा हो चुका हो और इश्क की हद तक पहुँच चुका हो तो उसके हक में ज़रूर सिमा होता है।
सूफियों में जो सिमा राइज है, उसकी बिना और अस्ल यही बात है और सिमा आतिशे इश्क भड़काने में बड़ा असर रखता है। सूफियों में बाज़ वो होते हैं, जिनको दौराने सिमा मकाशिफात होते हैं। उसमें इनको वो लुत्फ हासिल होता है, जो सिमा के अलावा नसीब नहीं हो सकता और वो लुत्फ आहवाल जो सिमा के दौरान उन पर वारिद होते हैं। उन्हें वज्द कहते हैं और यह भी होता है कि उनका दिल सिमा से इस कद्र पाक-ओ-साफ हो जाता है। जिसतरह चाँदी को आग में डालने से उसका मैल कुचेल साफ कर देते हैं। सिमा भी दिल में ऐसी ही आग लगा देता है, जिससे दिल की तमाम गर्द धुल जाती है और यह चीज बाज़वक्त बहुत सी रियाज़तों से भी हासिल नहीं हो सकती और इस मुनासिबत को, जो रूहे इन्सानी को आलमे अरवाह से काम तेज़तर कर देता है। चुनाँचे बाजवक्त यह हालत होती है कि वो कुल्लियात इस आलमे फानी से कट जाता है और जो कुछ इस जहान में है। उससे बेखबर हो जाता है और यह भी होता है कि उसके अज़ा की ताकत जाती रहती है और वह गिर पड़ता है और बेहोश हो जाता है।
बरें सगीर में इस्लाम के मुबल्लिगे आज़म हज़रत ख़्वाजाए ख़्वाजगाँ मोईनुद्दीन हसन चिश्ती (रजि.) हैं। सिमा उन्हीं से राइज हुआ। अगर यह शरीअत के ऐन मुताबिक न होता तो ख़्वाजाए बुजुर्ग हरगिज़ इसको रिवाज न देते।
"इन्सान का इन्फीरादी ज़ौक और पसन्द को भी सिमा की पसन्द और नापसन्दगी में बड़ा दखल है। हर शख़्स की पसन्द एक जैसी नहीं हो सकती, किसी को हिसाब व साइन्स से दिलचस्पी है तो कोई शेअर और शाएरी से लुत्फ अन्दोज़ होता है। इसी तरह सिमा से लुत्फ अन्दोज़ वही होगा जो साहिबे दिल होगा जिसके दिल में दर्द होगा। इस दर्द को सुरीली आवाज़ साज़ से निकलने वाली आवाज़ इन्सानी दर्द को उसी तरह उभारती है जिस तरह पत्थर पर लोहे की रगड़ पड़ने से उसके अन्दर से चिंगारी बाहर निकलती है। सिमा वैसे तो कुछ सलासिल में ही राईज है कहीं मज़ामिर के साथ, कहीं बगैर मज़ामिर के।
बुजुर्गाने दीन और सूफियए किराम ने इसके लिए कुछ उसूल मुरत्तिब किये हैं। सिमा इबादत का दर्जा रखती है इसलिए इसका वक़्त भी पुरसुकून व दुन्यावी मामलात से हटकर होना चाहिए व ऐसी जगह हो जहाँ शोर-शराबा न हो।"
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