Hazrat Khwaja Garib Nawaz information helps devotees understand the spiritual importance of visiting the sacred dargah in Ajmer Sharif. People from different countries come for ziyarat, darshan, dua, and peaceful moments at the holy place. The dargah is known for its atmosphere of respect, prayer, and hope. Visitors often seek guidance about timings, entry details, traditions, and the best way to experience the spiritual environment with sincerity and devotion during their visit.
यहाँ सर झुकाते हैं औलिया
शैख फरीदुद्दीन गंजे शकर (मुतवफ़्फ़ा 1266 ई.) (पाकपटन, पाकिस्तान)
ज़वाहरे फरीदी में मरकूम है रूरू शैख फरीदुद्दीन गंजे शकर की हाज़री उस ज़माने में हुई है कि जब मौजूदा अजमेर की आबादी एक गाँव से ज्यादा नहीं थी। हजरत ख़्वाजा गरीब नवाज़ का मज़ार शरीफ एक हुजरे में था और हुजरे के गिर्द दरख़्तों की कतारे चारो दीवार का काम दे रही थीं। उन चार दीवारी से बाहर खुद्दामीन-ए-ख़्वाजा की झोपड़ियाँ पड़ी हुई थी। जो हज़रत के मज़ार की खिदमत करते और दिन रात खुदा की इबादत उनका मशगला था और खेती बाड़ी करके अपना पेट भरते थे।
शैखुल इस्लाम हज़रत ख़्वाजा फरीदुद्दीन जब अजमेर पहुँचे तो किसी को खबर न हुई कि हमारे मख़्दूम के मज़ार पर आज यह कौन दरवेश आया है और किसी ने नहीं पहचाना कि इस दरवेश को चिश्तियों की बादशाहत हासिल है। मगर कुछ दिन बाद जब हाल मालूम हो गया तो सब खुदा वालों ने आपकी सोहबत से बड़ा लुत्फ उठाया।
हज़रत शैख शफुद्दीन बू-अली शाह कलन्दर (मुतवफ़्फ़ा 1324 ई.) पानीपत, हरियाणा
आपको हिन्दुस्तान के औलिया-ए-किराम में बहुत बुलन्द मर्तबा के हामिल हैं।
हज़रत कुतुबद्दीन बख्तियार काकी से आपको शर्फ-बैत हासिल हुआ। ये बात मशहूर है कि जब आप बारगाहे ग़रीब नवाज़ में हाजिर हुए तो उस वक़्त सरकार गरीब नवाज़ का मज़ार कच्चा था। आपने रोज़ा-ए-मुनव्वरा के खुद्दामीन से फरमाया कि आप लोग इस मज़ार की ख़िदमत करोगे तो आपकी औलादें खूब फलेंगी-फूलेंगी।
हज़रत बाबा ईशाक मग़रिबी (खाटू, राजस्थान)
सुल्तान फिरोज़शाह के दौर 753 ई. में आपकी विलायत की बहुत शोहरत थी। इसी दौर में आप बारगाहे ग़रीब नवाज़ में हाजिर हुए और एक मुद्दत तक आप यहीं रहे। ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ ने अपने रूहानी फैज़-ओ-बरकात से आपको नवाज़ा और आलमे रूईया मे आपको खाटू जाने की इजाजत दी। आप खाटू तशरीफ ले गये और वहीं ताजिन्दगी मुकीम रहे। आपका मज़ारे मुबारक भी खाटू जिला-नागौर राजस्थान में है। शैख अहमद खाटू आपके खलीफा हैं।
मौलाना फखरुद्दीन ज़र्रावी (मुतवफ़्फ़ा 1347 ई.)
आप हज़रत निजामुद्दीन औलिया महबूबे इलाही के मुरीद व खलीफा हैं। आपने हज़रत ख़्वाजा बुजुर्ग के मर्कज़े अतहर की ज़ियारत का शर्फ हासिल किया और यहाँ से फैज़-ओ-बरकात हासिल करके रवाना हुए। बाज़ किताबों में मरकूम है कि आपको कई मर्तबा हाज़री का शर्फ नसीब हुआ।
हज़रत शैख जैनुद्दीन शिराजी (मुतवफ़्फ़ा 1370 ई.)
(खुल्दाबाद, महाराष्ट्र)
752 हिजरी मे हज़रत निजामुद्दीन औलिया से इजाजत याफ्ता हज़रत शैख बुरहानउद्दीन के खलीफा, हज़रत शैख जैनुद्दीन भी बारगाहे गरीब नवाज़ मे हाजिर हुए।
हज़रत मख्दूम जहाँनियाने जहाँगश्त (मुतवफ़्फ़ा 1384 ई.) (ऊच, बहावलपुर, पाकिस्तान)
785 हिजरी में आप अजमेर तशरीफ लाये। आपने हज़रत निजामुद्दीन औलिया से ख्वाब में खिर्का-ए-खिलाफत हासिल किया। वहीं हजरत ख्वाजा नसीरुद्दीन चिरागे देहल्वी से आपको ऐन हालते बैदारी में खिर्का-ए-खिलाफत अता हुआ। आपने मज़ारे
मुबारक के बाहर आहता-ए-नूर में एक खिरनी का दरख़्त भी लगाया जो आज भी मौजूद है जहाँ बच्चों की मन्नत पूरी करने के लिये तराजू पर तोला जाता है। आपका मज़ारे मुबारक मुल्तान से 70 मील के फासले पर आबा मे मौजूद है।
हज़रत शैख मख्दूम अशरफ समनानी (मुतवफ़्फ़ा 1405 ई.) (किछौछा, उत्तर प्रदेश)
अपनी वफात से कई साल पहले आप बारगाहे गरीब नवाज़ मे हाज़री के लिये आये। जब आप हाज़िरे आस्ताना हुए तो बेइख़्तेयार पुकार उठे की बारगाहे सुल्तानुल आरेफीन में एक तही दस्त हाज़िर है कि इसे गौहरे मकसूद मिले और ख़्वाजा के फुयूज़ो बरकात से मुस्तफिज़ हुए।
आपके मुताल्लेकीन सैयद शाह अली हुसैन और हज़रत सैयद मोहद्दीसे आज़मे हिन्द ताज़िन्दगी बारगाहे गरीब नवाज़ में हाज़री देते रहे हैं।
हज़रत ख़्वाजा बन्दानवाज़ गैसूदराज़ (मुतवफ़्फ़ा 1422 ई.) (गुलबर्गा, कर्नाटका)
जब आपको हज़रत ख़्वाजा नसीरुद्दीन चिरागे देहल्वी से खिलाफत अता हुई तो आप रोज़ा-ए-पुर अनवार हुजूर गरीब नवाज़ पर हाज़री हुई और बारगाह-ए-ख़्वाजा में मुकीम रहे और सातवें दिन हुजूर गरीब नवाज़ ने बशारत दी कि "जाओ हमने तुम्हें सुल्ताने दक्कन बनाया उसके बाद आप विलायत की सनद लेकर गुलबर्गा की जानिब गामज़न हुए।
हज़रत बदीऊद्दीन शाह मदार (मुतवफ़्फ़ा 1434 ई.) (मकनपुर, उत्तर प्रदेश)
आप जब हिन्दुस्तान तशरीफ लाये तो सबसे पहले बारगाहे ग़रीब नवाज़ मे हाज़री दी। कुछ रोज़ पहाड़ी कुला पर मुतफ्फिक रहे और फिर हज़रत ख़्वाजा बुजुर्ग के बातिनी इशारे पर कालपी तशरीफ ले गये। आपका मज़ारे मुबारक मकनपुर में है। अजमेर के शर्की पहाड़ी पर आपका चिल्ला भी है।
हज़रत शाह मूसा सुहाग (मुतवफ़्फ़ा 1475 ई.) (शाही बाग, अहमदाबाद )
जब आप दुनियावी इल्म हासिल कर चुके तो आप इल्म-ए-इरफान की तलाश में मरकज़े इरफाँ आस्ताना हुजूर गरीब नवाज़ पर तशरीफ लाये। बवक़्त हाज़िरी अपना मुद्दा बयान किया। यहाँ से आपको हुक्म मिला कि जाओ तुम को जो भी मिलेगा हज़रत निजामुद्दीन औलिया की बारगाह से मिलेगा। आखिरकार हज़रत मूसा को हज़रत निजामुद्दीन औलिया की बारगाह से खिर्का-ए-विलायत मिली।
हज़रत कादिर वली शाह हमीद (मुतवफ़्फ़ा 1570 ई.) (नागौर, तमिलनाडू)
आप कादिर वली के नाम से ना सिर्फ जुनूबी हिदुस्तान में मशहूर हैं, बल्कि इण्डोनेशिया, मलेशिया, श्रीलंका, सिंगापुर तक इनकी शोहरत फैली हुई है और इनका आस्ताना आज भी नागौर मे अकीदत का मरकज़ बना हुआ है। आप हज़रत शाह मोहम्मद गौस ग्वालियरी के खलीफा हैं। 931 हिजरी मे अजमेर शरीफ हाजिर हुऐ तो इनकी आमद का कश्फ खुद्दामे ख़्वाजा में से कुछ लोगों को हुआ तो वह आपकी ताज़ीम के लिये अजमेर से बाहर निकल आये और आपका इस्तकबाल किया और इनके साथियों की भी तवाज़ो की।
हज़रत शैख सलीम चिश्ती (मुतवफ़्फ़ा 1572 ई.) (फतेहपुर सीकरी, उत्तर प्रदेश)
आप बाबा फरीदद्दीन गंजे शकर की औलाद में से हैं। अपने दौर के साहिबे कश्फो करामात बुजुर्ग गुजरे हैं। बादशाह अकबर और शेरशाह सूरी को आपसे बेपनाह अकीदत थी। एक मर्तबा आप और बादशाह अकबर दरबारे गरीब नवाज में हाजिर थे। कई रोज गुजर गये मगर मज़ारे अक्दस पर शर्फे बारयाबी हासिल नहीं हुई। एक दिन बादशाह अकबर ने आपसे दरियाफ्ता किया "हज़रत ख़्वाजा बुजुर्ग की शान क्या है?" आपने फरमाया कि ख़्वाजा बुजुर्ग की शान यह है कि " अकबर जैसा बादशाह और सलीम जैसा मिस्कीन अर्से से दरबार मे हाजिर हैं, मगर अब तक शर्फे बारयाबी नसीब नही हुई।"
हज़रत शैख मुजद्दीद अल्फे सानी (मुतवफ़्फ़ा 1624 ई.)
(सिरहिन्द, पंजाब)
आप हिन्दुस्तान में सिलसिला-ए-नक्शबन्दिया के अहम बुजुर्ग हैं। ख़्वाजा गरीब नवाज़ की बारगाह में जब हाज़री के लिये आये हुए थे तो यहाँ के मुजाविरों ने आपकी बड़ी ताज़ीम व तकरीम की और आपको रोज़ा-ए-मुबारक का गिलाफ नज्र किया। आपने निहायत अदब के साथ उसे कबूल फरमाया और दिल मे एक आह खींची और ये कलमा उनकी जुबान से निकला "हज़रत ख़्वाजा के पास जो लिबास था इनायत फरमाया, इसको मेरे कफन के लिये महफूज़ रखा जाए।"
इस वाकिये से यह साबित हुआ की खुद्दामे ख़्वाजा साहब माज़ी बईद में भी यह इख़्तेयार खुद गिलाफ देने के मजाज़ थे, और खुद्दामे ख़्वाजा का दिया हुआ तबरूक-ए-मज़ार, ख़्वाजा का अतिया समझकर मुजद्दीद अल्फे सानी जैसे बुजुर्ग ने कबूल किया।
हज़रत शैख अब्दुल हक मोहद्दिस देहल्वी (मुतवफ़्फ़ा 1642 ई.) (महरौली, दिल्ली)
आपको सरकारे दो आलम (स.अ.व.) ने हुक्म दिया था कि जब हिन्दुस्तान पहुँचो तो पहला कुयाम अजमेर में करना कि वही इल्म-ओ-इरफान का मरकज़ है। अलगर्ज़ हज़रत अब्दुल हक मोहद्दिस देहल्वी अजमेर पहुँचे सबसे पहले तो सरकार गरीब नवाज़ के दरबार में हाज़िर होकर मारूज़ा पेश किया। वह इसतरह से बयान किया जाता है कि "गरीब नवाज़ मैं अपना तमाम इल्म इस चौखट के बाहर छोड़ आया हूँ और यह दामन खाली है, आप जो चाहे अता करें।" आपको सिलसिला-ए-कादरिया, नक़्शबन्दिया के अलावा सिलसिला-ए-चिश्तिया से भी खिलाफत अपने पीरो मुर्शिद सैयद शैख अब्दुल वहाब मुतक्की से भी हासिल हुई।
हज़रत शाह अबुल औला अकबराबादी (मुतवफ़्फ़ा 1651 ई.) (आगरा, उत्तर प्रदेश)
आप अहदे जहाँगीरी के बुजुर्ग और अबुल औलाई सिलसिले के बानी हैं, आपने हज़रत अमीर अब्दुल्लाह नक़्शबंदी से बैत हासिल की मगर फैज़-ए-रूही हज़रत ख़्वाजा बुजुर्ग से है, हज़रत ख़्वाजा अबुल औला ने कई मर्तबा ख़्वाजा गरीब नवाज़ के रोज़ा-ए-मुबारक पर हाज़रियाँ दीं। एक मर्तबा
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